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कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर गहन विमर्श: प्रो. राहुल डे’ के विचार

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27th February 2026

हमें प्रो. राहुल डे’ — संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मेमोरिक एआई एलएलपी तथा भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलुरु के सेवानिवृत्त प्रोफेसर — की मेजबानी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने 26–27 फरवरी को आयोजित दो दिवसीय सत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर गहन, विचारोत्तेजक एवं भविष्य उन्मुख चर्चा प्रस्तुत की।

यद्यपि सत्रों में जनरेटिव एआई के तकनीकी आधार—जैसे ट्रांसफॉर्मर आर्किटेक्चर, सेल्फ-अटेंशन, फाइन-ट्यूनिंग, आरएलएचएफ, आरएजी तथा एएनआई से एजीआई तक के विकसित होते आयाम—पर विस्तार से चर्चा की गई, किंतु इसकी वास्तविक गहराई इससे कहीं आगे थी। चर्चा शीघ्र ही इस प्रश्न की ओर अग्रसर हुई कि एआई कैसे कार्य करता है, से आगे बढ़कर यह कि एआई

शिक्षा, प्रबंधन अध्ययन एवं समालोचनात्मक चिंतन को किस प्रकार परिवर्तित कर रहा है।

आईआईएम विशाखापट्टनम के संकाय एवं शोधार्थियों के बीच हुई चर्चाओं से कई महत्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आए:
▪ क्या हमें समालोचनात्मक चिंतन के दर्शन की पुनः समीक्षा करनी चाहिए?
▪ क्या प्रबंधन शिक्षा में विपणन, सूचना प्रणाली एवं संगठनात्मक व्यवहार जैसे क्षेत्रों में अवधारणात्मक समझ पर अधिक बल दिया जाना चाहिए, बजाय केवल एआई के उपयोग पर केंद्रित रहने के?
▪ क्या विद्यार्थियों के लिए मूलभूत कोडिंग ज्ञान आवश्यक हो गया है?
▪ क्या ‘प्रॉम्प्टिंग’ एक ऐसा कौशल है जिसे औपचारिक रूप से सिखाया जाना चाहिए?
▪ क्या प्रत्येक संस्थान को स्पष्ट एआई नीति निर्धारित करनी चाहिए?

इन सत्रों को विशेष रूप से रोचक बनाने वाला पहलू विभिन्न उपकरणों पर आधारित व्यावहारिक प्रयोगों पर दिया गया जोर था। प्रतिभागियों ने ChatGPT, NotebookLM, Claude, Humata AI, Research Rabbit आदि प्लेटफॉर्म्स के परिणामों की तुलना की तथा उनके उत्तरों की संरचना, समानताएँ, भिन्नताएँ, संभावित त्रुटियाँ (हैलुसिनेशन) एवं विश्लेषणात्मक गहराई का विश्लेषण किया।
इन चर्चाओं से दो प्रमुख निष्कर्ष सामने आए—पहला, विभिन्न उपकरण ज्ञान की भिन्न-भिन्न संरचनाएँ प्रस्तुत करते हैं; और दूसरा, दक्षता केवल उपकरण पर ही नहीं, बल्कि प्रॉम्प्ट की गुणवत्ता पर भी निर्भर करती है।

इसके अतिरिक्त, GPT द्वारा निर्मित कोड का उपयोग करते हुए ‘बीयर गेम’ का एक पाइथन-आधारित सिमुलेशन भी प्रस्तुत किया गया, जिसने आपूर्ति श्रृंखला की जटिलताओं को सरलता से समझाया। इस अभ्यास ने यह दर्शाया कि एआई-सहायित कोडिंग शिक्षण में प्रयोगों को तीव्र बना सकती है, किन्तु इसके लिए मानवीय सत्यापन एवं व्याख्या अभी भी आवश्यक है।

सत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार “संदेहशील बुद्धिमत्ता” (Skeptical Intelligence) के विकास का आह्वान था—

न तो एआई से दूरी,

न ही अंध स्वीकृति,

बल्कि अनुशासित जिज्ञासा, बौद्धिक विनम्रता, प्रमाण-आधारित सोच एवं वैकल्पिक परिकल्पनाओं के माध्यम से एआई के परिणामों का समालोचनात्मक विश्लेषण।
हम प्रो. राहुल डे’ के प्रति उनके गहन ज्ञान, स्पष्टता, सहज हास्य एवं उन विचारोत्तेजक प्रश्नों के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं, जो इन दो दिनों के बाद भी लंबे समय तक हमारे साथ बने रहेंगे।
 

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